टॉडगढ़– ग्राम परिचय

टॉडगढ़ भारत का एक छोटा गांव है | यह राजस्थान के अजमेर-जिले का अतिरिक्त तहसील मुख्यालय है | इस ग्राम को राजस्थानी इतिहास के प्रथम चितेरे कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर सन् १८२१ में नामित किया गया | इसका पुराना नाम बरसावाड़ा था |

 

टॉडगढ़: इतिहास

बरसावाड़ा की स्थापना लगभग एक हज़ार वर्ष प्राचीन है | तब यहां केवल घने जंगल और जंगली जानवरों का साम्राज्य था | बरसा गूजर नाम के एक पशु पालक द्वारा यहां अपने पशु चराए जाते रहे | इस कारण यह स्थान बरसावाड़ा के नाम से पहचाना जाने लगा | बरसा गूजर की पत्नी चैना गूजरी द्वारा बनवाया गया देवजी का देवराटॉडगढ़ में आज भी विद्यमान है |

कालांतर में यहां मेर नाम से जानी जाने वाली एक जाति का आगमन हुआ | परिणामत: गूजर लोग यहां से पलायन कर गए | मेर लोगों के विस्तार के कारण टॉडगढ़और इसके आस -पास का सारा क्षेत्र मेरवाड़ा के नाम से जाना जाने लगा | परिस्तिथियों वश मेर लोगों का मूल व्यवसाय डाका डालना और चोरी करना बन गया था | बाहुबल ,डाकों और धारों के कारण मेरों का मेरवाड़ा के निकटस्थ क्षेत्र मेवाड़ और मारवाड़ में गहरा आतंक छा गया | जिससे उदयपुर तथा जोधपुर के तत्कालीन शासक तिलमिला उठे | इन्हें नियंत्रित करने के लिए उन्होंने अंग्रेजो से समझौता किया | परिणामस्वरूप सन् १८१८ में कर्नल जेम्स टॉडको उदयपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना पॉलिटिकल एजेंट बनाकर भेजा |

कर्नल जेम्स टॉड क्षेत्र में कानून और व्यवस्था कायम करने के उद्देश्य से सन् १८२१ में बरसवाड़ा आये और मेर आतंकियों पर विजय प्राप्त की | जिससे प्रसन्न होकर उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भीमसिंह ने बरसावाड़ा को टॉडगढ़ नाम दिया |

सन् १८२१ के बाद इस ग्राम की प्रगति का दौर प्रारम्भ हुआ | यहां तहसील मुख्यालय,पुलिस थाना ,डाक व तार घर ,चिकित्सालय ,डाक बंगला आदि बनाये गए| शिक्षा संस्थाओं की स्थापना हुई | अंग्रेजी सेनाओं में मेरों की भर्ती से विकास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ |मेरवाड़ा में टॉडगढ़ एक महत्वपूर्ण ग्राम के रूप में उभरा | भारतवर्ष के मानचित्र में टॉडगढ़ का नाम बड़े अक्षरों में छापा जाने लगा |

अठारहवीं शताब्दी में यहां जैन लोग आये और उन्नीसवीं सदी में ईसाई लोग |इस बीच अनेक जातियों के लोग भी टॉडगढ़ में आ बसे | टॉडगढ़ एक सुन्दर क़स्बा बन गया तथा व्यापार-व्यवसाय और प्रशासन का केंद्र भी |

पहाड़ों के बीच एक पहाड़ पर बसा है यह ग्राम | लगता है जैसे पहाड़ों के महासागर में किसी पहाड़ी द्वीप पर खड़े हों | पर्वतीय ढलानों पर बने छोटे- छोटे लिपे-पुते घर और चारों ओर फैली हरियाली आंखों को अमित आनंद की अनुभूति देती है |

प्रात:काल का उगता सूरज और सायं अस्ताचल की ओर बढ़ता सूर्य एक विशेष छटा बिखेरता है | लगता है- सूर्य आपसे मिलने आया था और मिलकर अब विदा ले रहा है |

जानने और देखने योग्य अनेक बिंदु यहां हैं | जिनमें- प्रज्ञा शिखर ,यूनाइटेड चर्च ऑफ़ नार्दर्न इंडिया , यादगार फतह जंग अजीम,भागलिया भगड़ , बाबा मेषनाथ की छतरी, पीपलाज माता का मंदिर , देव जी का देवरा , तेजा जी का स्थान , कैलाश मंदिर , विजयसिंह ‘पथिक’ एवं राव गोपालसिंह ‘खरवा’ का बन्दी गृह , मेह- सागर , केलावास तालाब , गूजर गम्मा तालाब , दुधालिया तालाबआदि हैं |

टॉडगढ़ एक शांत ,सुन्दर, स्वच्छ ,पर्यावरणमय ग्राम है | गांव यूं बसा है कि बरसात में भी कीचड़ नहीं होता | यहां मंदिर ,मस्जिद,गिरजाघर आदि उपासना के सभी केंद्र हैं | स्कूल,अस्पताल,डाक-घर,पुलिस स्टेशन,बैंक,डाक-बंगला,धर्मशाला है | नल,बिजली,तार-टेलिफोन आदि सुविधाओं से युक्त है-यह ग्राम |

 

टॉडगढ़ की भौगोलिक स्थिति :

मारवाड़ और मेवाड़ के संधि-स्थल पर मेरवाडा का यह प्रमुख ग्राम समुद्री सतह से ६९८ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है | इसके चारों और अरावली की वलयाकार पर्वत मालाएं हैं | जिनके कारण उत्तर से आने वाली बर्फीली हवाएं और पश्चिम से आने वाली गर्म हवाएँ यहां निष्प्रभाव हो जाती है और यहाँ का तापमान संतुलित बना रहता है | गर्मी में न अधिक गरमी और सर्दी में न अधिक सर्दी |यह आने वाला पर्यटक सदैव एक सुहाने मौसम का एहसास करता है |

टॉडगढ़ एक प्रदूषण मुक्त क्षेत्र है | यहां स्वच्छ एवं स्वास्थ्य वर्धक हवा चलती है | प्रथम श्वास में ही यहां पहुंच कर यह अनुभव किया जा सकता है | न भीड़ है न कोलाहल | चारों ओर शांति ही शांति | पर्यटकों को अथाह मानसिक विश्रांति प्रदान करती है- यह धरती |

 

टॉडगढ़ के आस-पास के दर्शनीय स्थल

टॉडगढ़ को केंद्र बनाकर पर्यटन महत्व के अनेक स्थलों का अवलोकन कियाजा सकता हैजैसे-दुधालेश्वर-महादेव,यूनाइटेड चर्च ऑफ़ नार्दर्न इंडिया ,कातरघाटी ,अन्जनेश्वर –महादेव ,गौरी धाम,सैंड माता,घोरम जी,मांगटजी, टॉडगढ़ रावली वन्य जीव अभयारण्य आदि यहां २५ किलोमीटर की निकटतम परिधि में हैं |

सवाई भोज ,सिरियारी ,कंटालिया , बगड़ी ,सम्बोधि-उपवन ,केलवा ,राजनगर ,गंगानगर,नाथद्वारा ,हल्दीघाटी ,चारभुजा ,कुम्भलगढ़ आदि एक सौ किलोमीटर की परिधि के दर्शनीय स्थल है |

पुष्कर ,अजमेर उदयपुर ,राणकपुर ,जोधपुर ,माउंट आबू आदि १५० किलोमीटर लगभग चलने पर देखे जा सकते हैं |

 

दुधालेश्वर महादेव

टॉडगढ़ ग्राम से केवल ७ किलो मीटर दूर घने जंगल में स्थित है- यह मनोहारी स्थल | पिछले सैकड़ों वर्षों से यहां एक स्वच्छ जल धारा निरंतर समपरिमाण में बह रही है | इसका जल खनिज तत्वों से भरपूर और अत्यंत पाचक है | एक और पर्यटकों के लिए यह प्रकृति का उपहार है | वहां दूसरीओर श्रद्धालुओं के लिए यह पवित्र गंगाजल | यहां बने शिव मंदिर ने धार्मिक आस्था को घनीभूत किया है | कहते हैं- यहां भगवान शिव एक ग्रामीण पशु पालक भक्त खंगार जी को साक्षात दर्शन दिए थे | आने वालों के लिए यहां रहने, खाने आदि की व्यवस्थाएं भी हैं | वन विभाग राजस्थान द्वारा यहां एक छोटा आधुनिक ईको डेस्टिनेशन तथा जेम्स टॉड नेचर ट्रेल भी बनाये गए हैं |

 

कातर घाटी

मेवाड़ और मारवाड़ क्षेत्र को टॉडगढ़ होते हुए जोड़ने वाला माध्यम है-यह मार्ग | अंग्रेजी शासनकाल में दक्ष शिल्प-तज्ञों की योजना से बनवाया गया यह मार्ग यूं लगता है मानो अरावली पर्वत की छाती पर कुंडली मारे लेती है कोई काली नागिन | इसमें एक साथ तेरह यू-टर्न हैं ,जिन्हें ऊपर से एक साथ भी देखा जा सकता है | भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र देश के उन जल विभाजक क्षेत्रों में से एक है-जिनका पश्चिम की ओर बहने वाला जल अरब सागर में तथा पूर्व की ओर बहने वाला जल बंगाल की खाड़ी में जाता है | टॉडगढ़ से केवल ४ किलोमीटर दूर प्रारम्भ होकर यह दृश्य आगे ४ किलो मीटर तक मन को आनन्दित करता है | यहां से टॉडगढ़रावली वन्य –जीव अभ्यारण्यके अनेक सुन्दर नज़ारे भी दृष्टिगत होते हैं |

 

यूनाइटेड चर्च ऑफ़ नार्दर्न इंडिया

सन् १८६३ में इंग्लैंड से आये ईसाई पादरी विलिअम रॉब ने खिस्ती उपासना के लिए टॉडगढ़ में यह गिरजाघर बनाया | अंग्रेजी स्थापत्य कला और ईसाई संस्कृति का यह संगम है | प्राटेस्टेन्ट ईसाईयों का यह उपासना स्थल है और विदेशी पर्यटकों का एक आकर्षण | ग्राम के उत्तरी पूर्वी भाग में एक पहाड़ी पर स्थित यह हेरिटेज ईमारत सहज ही पर्यटकों की दृष्टि खींचती है |

 

यादगार फतह जंग अजीम

प्रथम विश्व युद्ध (१९१४-१९१९) में अंग्रेजी सरकार की ओर से युद्ध करने हेतु टॉडगढ़ तहसील के २५९७ सैनिक गए थे | जिनमें से १२४ वहां बलिदान हो गए | उन बलिदानी सैनिकों की स्मृति हेतु अंग्रेजी शासन के दौरान ग्राम-टॉडगढ़ में विक्ट्री मेमोरियल धर्मशाला नाम से एक सैनिक विश्राम गृह बनाया गया तथा उसमें बलिदान की स्मृति रेखाएं अंकित कर एक विशेष शिलालेख स्थापित किया गया है | मगरा मेरवाड़ा के बलिदानी सैनिकों को विशेष सम्मान प्रदान करने वाला यह शिलालेख मेरवाडा वासियों का गौरव है |

 

नीलकंठ महादेव

टॉडगढ़ से ६० किलोमीटर दूर स्थित है- नीलकंठ महादेव | यहाँ कभी श्रृंगी ऋषि ने साधना की थी |जन सहयोग एवं राजकीय अनुदान से इसे हाल ही विकसित किया गया है | वैष्णव देवी मंदिर और दैवीय गुफ़ाएं यहां के विशेष आकर्षण हैं | टॉडगढ़ रावली पर्यटन अंचल की उत्तरी सीमा का आकर्षण है यह स्थान | निकट ही ब्यावर शहर होने के कारण यहां पर्यटकों का आवागमन बना रहता है |

 

रावली धूनी

टॉडगढ़ से कोई १० किलोमीटर दूर स्थित है- रावली धूनी मंदिर | वन- विभाग,राजस्थान के ब्रिटिश कालीन डाक बंगला और सिंचाई– विभाग ,राजस्थान द्वारा एक ऐनीकेट बनाकर इसकी स्थिति को महत्व प्रदान किया गया है | प्राचीन काल में थानरावल जी नाम के एक संत ने यहां तपस्या की थी और अपनी चमत्कारी विद्याओं से अनेक चमत्कार दिखाए थे | धूनी मंदिर हज़ारों पर्यटकों का श्रद्धा केंद्र है तथा ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण पर्यटकों का आकर्षण भी | वर्षा ऋतु में ऐनीकेट भर जाने पर जल- पक्षियों की आवाजाही से इस स्थान का प्राकृतिक सौंदर्य और अधिक बढ़ जाता है |

 

टॉडगढ़ –रावली वन्य-जीव अभयारण्य

विश्व के प्राचीनतम पर्वत अरावली के ४९५.२७ वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में फैला यह विश्व-विख्यात अभयारण्य राजस्थान का चौथा सबसे बड़ा वन्य जीव विहार है | इसमें चीतल,सांभर,बारहसिंगा,तेंदुआ,लकड़बग्घा,भालू,नीलगाय,चीता,जंगली सूअर,बिज्जू,सेही,सियार,लोमड़ी ,भेडिये,खरगोश,बन्दर,आदि,जंगली जानवर देखे जा सकते हैं |मोर, तीतर,बटेर,कुरजां,जंगलीमुर्गे,उल्लू,हार्नबिल,हरियल,कठफोड़ा,तोता,मैना,बुलबुल,
नीलकंठ,कोयल,बाज़,गिद्ध,चील,चमगादड़ एवं अन्य अनेक रंगबिरंगे पक्षी यहाँ नज़र आते है|वन-विभाग, राजस्थान की ओर से घोरमघाट एवं काबरादांता में वन्य- जीव- दर्शन की सुविधा भी है |

धौक,सालर,गौल,जामुन,महुआ,बेर,गूलर,चुरेल,खेर कूमठ आदि विविध वृक्षों सेआच्छादित यह वन क्षेत्र कभी ब्रिटिश शासकों का चहेता शिकारगाह रहा था| इसमें अनेक वनौषधियां भी उपलब्ध हैं | नयनाभिराम दृश्यावलियों की यहां खान है| फोटोग्राफरों के लिए तो मानो यह एक स्वर्ग है | इस अभयारण्य में भीलबेरी एवं दुधालेश्वर महादेव नाम के दो ईको डेस्टिनेशन विकसित किए गए हैं | वन- विहार के लिए इसमें अनेक पदयात्रा मार्ग भी हैं |