प्रज्ञा शिखर

प्रज्ञा-शिखर एक ऐसे पर्यटन परिवेश का नाम है –जहाँ शांति, नैसर्गिक सौंदर्य, प्रदूषण मुक्त वातावरण एवं स्वास्थ्य वर्धक आबो हवा पसरी है | जहाँ पहुँचकर मन आंनदित हो जाए | यहां पर पहुंचने वाले को श्वास लेने मात्र से ही स्थान की विशुद्धता का अहसास हो जाता है | दृश्य देखते ही पर्यटकों के मुंह से सहज निकल पड़ता है –वंडरफुल |वैरी पीसफुल | वैरी ब्यूटीफुल |

अतिविशिष्ट भौगोलिक स्थिति वाली ऐसी पहाड़ी चोटी जो चारों ओर अनेक पहाड़ी चोटियों से घिरी है |प्रज्ञा-शिखर की ऊंचाई एवं चारों ओर से इसके खुले होने के कारण सदैव यहां स्वच्छ हवा चलती रहती है | तपती गर्म दुपहरी में भी यहाँ पर्यटक किंचित भी परेशान नहीं होता | यहाँ सर्दी और गर्मी के संतुलन का सुखद संयोग है | प्रातःकालीन सूर्योदय और सायंकालीन सूर्यास्त के दृश्य दर्शकों को मोहित का देते हैं – यहाँ | चांदनी रात की अथाह शांति ओर शीतलता प्रज्ञा-शिखर पर व्यक्ति को मंत्र मुग्ध कर देती है | वर्षा ऋतु में इन पहाडियों के हरे भरे हो जाने से इसकी सुन्दरता में चार चांद लग जाते हैं | यत्र-तत्र पहाडियों पर बने, लिपे-पुते घर भी अत्यंत मनोहारी प्रतीत होते हैं |

प्रकृति के इन अवदानों के बीच प्रज्ञा-शिखर पर मानव ने भी अपनी एक छाप छोड़ी है | यहां जैन संत आचार्य तुलसी की स्मृति में “ महाशिला अभिलेख “ नामक एक विशाल स्तम्भ निर्मित किया गया है | बारह वर्ष के श्रम और करोड़ों की लागत से निर्मित ‘महाशिला-अभिलेख’ प्रज्ञा-शिखर पर अरावली के माथे का मुकुट सा है |

 

इतिहास

प्रज्ञा-शिखर, टॉडगढ़ की प्रचीनतम इमारतों में से एक है | इसका निर्माण सन् १८६३ में इंग्लैंड से आए ईसाई पादरी विलियम रॉब ने अपने निवास स्थान के रूप में करवाया था | विलियम रॉब टॉडगढ़ में ईसाई धर्म के संस्थापक थे | उन्होंने टॉडगढ़ में गिरजाघर का भी निर्माण करवाया था | तेरह वर्ष यहां रहने के बाद विलियम रॉब पुनः इंग्लैंड चले गए | तत्पश्चात उनका यह निवास देखभाल के आभाव में खंडहर होता चला गया | लोग इसे ‘फूटा बंगला’ कहकर पुकारने लगे | इसकी मिलकियत यूनानी एस्टेट प्रेस बिटेरियन मिशन स्कॉटलैंड के नाम बनी रही | कालांतर में यह राजस्थान चर्च काउंसिल एसोसिएशन के पास आ गई|

सन् १९६९ की २० सितम्बर को इसे बिक्री कर दिया गया | स्व.एफ.डी.लाल ने इसे ख़रीदा |१५वर्ष उनके पास रहने के बाद उनके पुत्रों द्वारा जून सन् १९८४ को इसे साहित्य-संस्थान नामक पंजीकृत, गैर सरकारी,जन सेवी संस्था को बेचा गया | इस संस्था ने इसका कायाकल्प किया | इसे पुनः जनोपयोगी बनाया | टूटती इमारत का वृक्षारोपण,जनकल्याणकारी प्रवृत्तियों का सूत्रपात सौंन्दर्यीकरण,शताब्दी शिला व महाशिला अभिलेख की स्थापना आदि करके साहित्य संस्थान ने इसे एक बहुआयामी और दर्शनीय प्रकल्प का रूप दे दिया जिसका अवलोकन कर आज सभी जन हर्षित होते हैं|

 

प्रज्ञा शिखर पर दर्शनीय

महाशिला अभिलेख

महाशिला अभिलेखप्रज्ञा-शिखर के दर्शानिय बिंदुओं में से सबसे महत्वपूर्ण है । यह स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है ।

 

शताब्दी शिला

शताब्दी शिला- ग्राम टॉडगढ का प्रारंभ से सन 1991 तक का संक्षिप्त इतिहास शताब्दी शिला पर अंकित कर परिसर के उत्तरी भाग में मुख्य भवन के पास स्थापित किया गया है ।

शताब्दी शिला टॉडगढ़ ग्राम के इतिहास को अपने आप में वेष्टित किए हुए है |इस शताब्दी शिलालेख की लम्बाई शताब्दी के प्रतिक के रूप में एक सौ इंच रखी गयी है | इस शिलालेख में टॉडगढ़ के आरम्भ से सन १९९१ तक की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख है |

जैन चतुर्मासों की शताब्दी पूर्णता पर सन् १९९१ में इसे जैन ट्रस्टों के सहयोग से स्थापित किया गया था |इस शिलालेख का अनावरण आचार्य श्री तुलसी की शिष्या साध्वी श्री चांदकंवर जी (टॉडगढ़ )के पावन सान्निध्य में तत्कालीन केंद्रीय दूरभाष एवं संचार उपमंत्री सुश्री गिरिजा व्यास के कर कमलो द्वारा संपन्न हुआ |

शताब्दी-शिलालेख ग्रामीण स्तर पर इतिहास को सहेज कर रखने का प्रथम उदहारण है | राजस्थान पत्रिका दैनिक ने इसे अपने ‘आओ गांव चलें’ स्तम्भ के अन्तर्गत सचित्र प्रकाशित किया तथा इस शिला पर अंकित लेख को अपने पत्र में यथावत छापा था ।

 

आचार्य तुलसी संदर्शन

भारतीय संत परम्परा के उज्ज्वल नक्षत्र थे - आचार्य तुलसी | अपना सारा जीवन उन्होंने मानवीय चारित्रोथान के लिए अर्पित किया | इस हेतु उन्होंने ६०००० किलो मीटर नंगे पैरों पदयात्रा की | दो बार वे अपने धर्म परिवार के साथ प्रज्ञा-शिखर पर आये थे | वे ही साहित्य-संस्थान के प्रेरणा स्रोत रहे |

आचार्य तुलसी वाङ्मय दर्शन

‘‘आचार्य श्री तुलसी वाङ्मय दर्शन’’ के नाम से गुरुदेव श्री तुलसी की प्रकाशित पुस्तकों की एक प्रदर्शनी मुख्य भवन के एक कक्ष में लगाई गई है । देश में ऐसा पहली बार साहित्य संस्थान द्वारा किया गया है। यह प्रदर्शनी गुरूदेव की साहित्यिक प्रतिभा को उजागर करती है । आचार्य जी की १५० प्रकाशित पुस्तकें इसमें प्रदर्शित हैं |

आचार्य श्री तुलसी कर्तृत्व दर्शन

चित्र प्रदर्शनी तुलसी द्वारा मानवीय चरित्रोथान के लिए गए प्रयत्नों की एक चित्र प्रदर्शनी संस्थान मुख्यालय पर मुख्य भवन के पार्श्ववर्ती भाग में लगाईं गई है । इससे आचार्य तुलसी का कर्तृत्व जन साधारण सरलता से समझ सकता है ।

 

कर्नल जेम्स टॉड संदर्शन

कर्नल जेम्स टॉड के जीवन-चित्रों और पुस्तकों से समृद्ध एक छोटा संकलन यहां टॉड के संबंध में प्रारंभिक जिज्ञासाओं को समाधान देता है | इसे कर्नल जेम्स टॉड संदर्शन कहते हैं |

 

प्रज्ञा-शिखर पर उपलब्ध सुविधाएँ

"महाप्रज्ञ- निलयम्" : अतिथि गृह

प्रज्ञा शिखर पर आने वाले अतिथियों के ठहरने के लिए परिसर के दक्षिणी किनारे पर महाप्रज्ञ-निलयम नामक अतिथि गृह बनाया गया है इसमे आधुनिक सुविधा सम्पन्न ६ कमरे विद्यमान है | इस के अतिरिक्त अतिथियों के लिए खाट, बिस्तर, रजाई, तकिये, चद्दर आदि के एक सौ सेट अलग से उपलब्ध है |

 

"महाश्रमण निकेतनम्": भोजनशाला

संस्था परिसर में आने वाले अतिथीयों के भोजन की समुचित व्यवस्था हेतु अतिथि गृह के ठीक सामने ‘‘महाश्रमण निकेतनम्’’ नामक भोजन शाला बनाई गई है । जिसमें एक सौ लोग एक साथ बैठकर भोजन कर सकते हैं । भोजनशाला स्टेनलेस स्टील के टेबुल एवं बैंचों से सज्जित है ।इसी के साथ रसोई घर भी है जिसमे निवेदन पर भोजन उपलब्ध होता है | संस्था-सदस्यों के लिए यह व्यस्वस्था नि:शुल्क है |

 

आचार्य श्री भिक्षु सभागृह

संस्था परिसर में बैठक, शिविर, सेमीनार आदि आयोजन के लिए ‘‘आचार्य श्री भिक्षु सभागृह’’ नामक सभागार बनाया गया है । जिसमें 300 लोग बैठ सकते हैं ।

 

आचार्य श्री तुलसी सभागार (मिनी थियेटर)

प्रवचन, सत्संग, सद्विचार मंथन और जन हितकारी सभाओं के लिये प्रज्ञा-शिखर पर एक सभागार है | इस सभागार में ५० लोगों के बैठने की व्यवस्था है | यह ध्वनि प्रसारण यन्त्र आदि से सुसज्जित है | जो अत्यल्प शुल्क में सर्व-साधारण को उपलब्ध करवाया जाता है |

 

विश्रांति गृह

अल्प समय लेकर आनेवाले पर्यटकों की सुविधा के लिए शताब्दी शिला उद्यान के निकट विश्राम गृह बनाया गया है । यहां पर्यटक कुछ समय विश्राम हेतू बैठ सकते हैं । बात कर सकते हैं ।

 

महात्मा गाँधी बाल क्रीडांगण

अतिथि बलाकों एवं विद्यालय छात्रों की खेल अभिरुचि का समाधान है - यह क्रीडांगण | इसमें बच्चों के लिए झूले, चाकरी, सी-सॉ आदि खेल उपकरण लगाये गए हैं |

 

आचार्य श्री तुलसी पर्यटन संकुल

महाशिला अभिलेख की छाया तले पहाड़ियां काटकर बनाया गया यह विशाल मैदान पर्यटकों की सुविधा के लिए है | यहाँ शिविर लग सकता है | उत्सव और मेला आयोजित किया जा सकता है | भारत के महामहिम राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अबुल कलाम अपनी टॉडगढ़ यात्रा के दौरान हेलीकॉप्टर से इसी संकुल में उतरे थे |

 

संस्था के प्रति लोक चिंतन

प्रज्ञा-शिखर पर लोगों का अच्छा आवागमन रहता है | लोग यहाँ के कार्य को देखकर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं | ग्रामीण क्षेत्र में दुरूह पर्वतीय भूमि पर, इतने कम खर्च से एक छोटी सी संस्था द्वारा किये गए इतने बड़े कार्य की बहुत प्रसंशा करते हैं | आचार्य श्री तुलसी,डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम, आचार्य महाप्रज्ञ ,महंत श्री मुरली मनोहर शरण जी ,शाहपुरा पीठाधीश्वर श्री रामदयाल जी महाराज आदि शिखर पुरुषों ने स्वयं पधारकर इसके प्रज्ञा शिखर परिसर को विशिष्टता प्रदान की |

आचार्य श्री तुलसी जी के शब्दों में "एक दिन यह जगह तेरापंथ के इतिहास का नया आयाम बनेगी |"

शाहपुरा पीठाधीश्वर रामदयालजी महाराज के विचार से "कर्नल जेम्स टॉड की धरती का मुकुट है- प्रज्ञा शिखर|"

 

प्रज्ञा-शिखर : दर्शकीय अभिमत

जिन्हें मानसिक शांति चाहिए वे जीवन में एक बार प्रज्ञा शिखर अवश्य जाएं |

- पी.डी.मेई,नेशनल लेवल मानिटर    ग्रामीण विकास मंत्रालय ,भारत सरकार

प्रज्ञा-शिखर एक बहुत सुन्दर स्थल है | यहां प्राकृतिक सौंदर्य में डूब कर आप अपनी समस्याओं को भूल सकते हैं |

- मिस एलिज़ाबेथ स्पीक

प्रिंसिपल ,राजकीय कन्या विद्यालय

सर्व-धर्म समभाव, सर्वजन हिताय एवं सर्व कल्याण का ज्योति-पुंज है - प्रज्ञा-शिखर |

- चन्दन दुबे

तहसीलदार

अत्यंत सुखद, शीतल,शांत और नैसर्गिक स्थल | मानवता,भाईचारा, साम्प्रदायिक-एकता और प्रेम का सन्देश प्रसारित कर रहा है –यह स्थान |

- जे .सी .शर्मा

एडिशनल ,एस.पी.

एक अजूबा स्थान |जहां परमात्मा के दर्शन किए जा सकते हैं |

- एस .के .खत्री

आर.एस.आर .टी .सी

प्रज्ञा-शिखर आकर नई स्फूर्ति मिली | यह स्थल अनेक दृष्टियों से स्फूर्ति देने वाला है |

- शुभु पटवा

पत्रकार

यहां पहुँचने के बाद जो अनुभूति हुई,वह शब्दातीत है |

- सागरमल कावड़िया

राष्ट्रीय अणुव्रत ,शिक्षक संसद

यह स्थान प्राचीन एवं नवीन कला का संगम है |

- सैय्यद आजम हुसैन

अधीक्षक ,राजकीय संग्राहलय